इतिहास: भारत और पाकिस्तान के बीच हुए इस समझौते के विरोध में नेता ने दिया इस्तीफ़ा

साल 1950 में आज ही के दिन भारत और पाकिस्तान के बीच नेहरू-लियाकत समझौता हुआ था. माना जाता है कि भारत के तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू और पाकिस्तान के प्रधानमंत्री लियाकत अली खान के बीच हुआ यह समझौता कामयाब नहीं हो पाया.

इतिहास: भारत और पाकिस्तान के बीच हुए इस समझौते के विरोध में नेता ने दिया इस्तीफ़ा

आजादी के साथ सौगात में मिले भारत और पाकिस्तान के बंटवारे के बाद दोनों देशों के बीच विवाद बढ़ा ही है. बंटवारे के समय दोनों देशों के बीच कई समझौते भी हुए. आज से 70 साल पहले यानी आजादी के कुछ ही सालों बाद साल 1950 में भारत और पाकिस्तान के बीच एक ऐसा समझौता हुआ था जो आज भी खास चर्चाओं में रहता है.

दरअसल साल 1950 में आज ही के दिन भारत और पाकिस्तान के बीच नेहरू-लियाकत समझौता हुआ था. माना जाता है कि भारत के तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू और पाकिस्तान के प्रधानमंत्री लियाकत अली खान के बीच हुआ यह समझौता कामयाब नहीं हो पाया. वहीं कई नेताओं ने इस समझौते का विरोध भी किया था, यहां तक कि श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने केंद्रीय मंत्रीमंडल में मंत्री पद से इस्तीफ़ा तक दे दिया था. नेहरू-लियाकत समझौते को दिल्ली पैक्ट के नाम से भी जाना जाता है. कहा जाता है कि यह भारत के बंटवारे के बाद भारत और पाकिस्तान के बीच द्विपक्षीय संधि थी. 

समझौते की मुख्य बातें 

•    अपनी संपत्ति का निपटान करने के लिए शरणार्थी भारत-पाकिस्तान के बीच आना–जाना कर सकते हैं.
•    बंटवारे के समय अगवा की गई महिलाएं और लूटी गई संपत्ति को वापस किया जाना था. 
•    इस समझौते में जबरन धर्मान्तरण को मान्यता नहीं दी गई थी.
•    दोनों देशों को अपने-अपने देश में अल्पसंख्यक आयोग गठित करने थे.

समझौते का कारण
•    समझौते का कारण था कि दोनों देशों की तरफ के धार्मिक अल्पसंख्यकों के बीच बैठे डर को कम किया जाए और लोगों के बीच रिश्ते अच्छे हो सकें.
•    इस समझौते के मुताबिक सभी अल्पसंख्यकों को मूलभूत अधिकार देने की गारंटी दी गई.
•    अल्पसंख्यक लोगों को अपने देशों के पॉलिटिकल पदों पर चुने जाने, और अपने देश की सिविल और आर्म्ड फोर्सेज़ में हिस्सा लेने का पूरा अधिकार दिया जाना था.
•    दोनों देशों की सरकार यह सुनिश्चित करेंगी कि अपने देश के अल्पसंख्यकों को वो अपने-अपने देश की सीमा में पूर्ण सुरक्षा का भरोसा दिलाया जाए.
•    जो लोग अपनी चल संपत्ति अपने साथ बॉडर के पार ले जाना चाहते हैं, उन्हें कोई रोक नहीं होगी. इनमें गहने भी शामिल थे. 
•    31 दिसंबर 1950 के पहले जो भी व्यक्ति वापस भारत आना चाहते थे वो आ सकते थे. उन्हें उनकी अचल संपत्ति लौटाना.
•    दोनों देशों की सरकार के एक-एक मंत्री प्रभावित क्षेत्रों में मौजूद रहें. जो यह सुनिश्चित कर सकेंगे कि समझौते की शर्तों का सही ढंग से पालन किया जा रहा है या नहीं.

इस समझौते का प्रारूप 2 अप्रैल 1950 को ही तैयार किया जा चुका था. इसके बाद लिय़ाकत अली जब दिल्ली दौरे पर आए और 8 अप्रैल को उन्होंने नेहरू के साथ इस समझौते पर हस्ताक्षर किए. मुख्य तौर पर ये संधि भारत के विभाजन के बाद दोनों देशों में अल्पसंख्यकों के अधिकारों की गारंटी देने की बात कर रही थी. इस संधि के अनुसार दोनों देशों में अल्पसंख्यक आयोग गठित किया गया. भारत में पूर्वी पाकिस्तान से 10 लाख से अधिक लोगों ने पश्चिम बंगाल में पलायन किया. बताया जाता है कि दोनों देशों में इसका पूरी तरह से पालन नहीं किया जा सका, हालांकि पाकिस्तान पर इसके ज्यादा आरोप लगाए गए हैं.

आज भी चर्चा में है समझौता
नागरिकता अधिनियम, 2019 को पारित करने से पहले लोक सभा बहस में विधेयक को सही ठहराते हुए गृह मंत्री अमित शाह ने इस समझौते की बात की थी. इसके बाद यह 70 साल बाद फिर चर्चाओं में आ गया. उन्होंने नेहरू-लियाकत समझौते को इस संशोधन की वजह बताते हुए कहा, “यदि पाकिस्तान द्वारा संधि का पालन किया गया होता, तो इस विधेयक को लाने की जरूरत ही नहीं थी.”

नेता श्यामा प्रसाद मुखर्जी का इस्तीफ़ा
इस समझौते के विरोध में डॉ. श्यामाप्रसाद मुखर्जी ने इस्तीफ़ा दे दिया था. मंत्री मुखर्जी तब हिंदू महासभा के नेता थे. उन्होंने समझौते को मुस्लिम तुष्टिकरण करने वाला बताया था. यह बात भी लगातार बहस का विषय बनी रही कि नेहरू-लियाकत समझौते ने अपने उद्देश्यों को हासिल किया या नहीं.