क्या आप भी जनसंख्या कानून का विरोध कर रहे हैं? जवाब अगर हां है तो आज आपको यह लेख जरूर पढ़ना चाहिए

आमतौर पर हमारे देश में हर वर्ष, हर महिने जनता के बीच कोई ना कोई ऐसा मुद्दा तो आ ही जाता है, जो कि सियासतदानों और जनता के बीच चर्चा के बाजार को गुलजार कर जाया करता है। इसी कड़ी में अब उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा लाए जाने वाला जनसंख्या नियंत्रण कानून भी इस रिवाज का हिस्सा बन गया है।

क्या आप भी जनसंख्या कानून का विरोध कर रहे हैं? जवाब अगर हां है तो आज आपको यह लेख जरूर पढ़ना चाहिए
CM Yogi

आमतौर पर हमारे देश में हर वर्ष, हर महिने जनता के बीच कोई ना कोई ऐसा मुद्दा तो आ ही जाता है, जो कि सियासतदानों और जनता के बीच चर्चा के बाजार को गुलजार कर जाया करता है। इसी कड़ी में अब उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा लाए जाने वाला जनसंख्या नियंत्रण कानून भी इस रिवाज का हिस्सा बन गया है। समाज का हर तबके के बीच बस इसी बात को लेकर बहस छिड़ी हुई है कि यह कानून हमारे  लिए सही है या गलत? खैर, यह तो भविष्य के गर्भ में छुपा है, लेकिन वर्तमान में  तमाम राजनीतिक दलों के नुमाइंदे व जनता देश के अन्य मुद्दों से स्थानातंरित होकर जनसंख्या नियंत्रण कानून पर विवेचना कर रहे हैं।

देश में आजाद के बाद से ही जनसंख्या नियंत्रण को लेकर कई चर्चाएं हुई कई सेमीनार किए गए लेकिन इसका परिणाम कुछ ना निकल सका। देश के शिर्ष संस्थाओं के द्वारा भी यह बताया जाता रहता है कि जनसंख्या के क्या-क्या दूषप्रभाव हो सकते हैं लेकिन इस कालखंड में कही ना कही इस जनसंख्या वृद्धि को सकारात्मक रुप से भी देखा गया। ये हम इसलिए कह रहे है क्योंकि उस वक्त देश को युवाओं की मौजूदगी बढ़ाने के रुप में इस कदम को देखा जाने लगा। अब बात करते हैं उत्तर प्रदेश की योग सरकार द्वारा लाए जाने वाला जनसंख्या नियंत्रण कानून के बारे में जो कि विधानसभा चुनाव से ठीक पहले लाया जा रहा है। इसके मायने क्या हैं? क्या इस वक्त ऐसे कानून की जरुरत है? जनसंख्या को नियंत्रित करने के लिए कानून से अलावा कोई और तरीके भी हो सकते है? क्या जनसंख्या नियंत्रण के लिए चीन की जैसी नीति पर काम कर सकते हैं। इस प्रकार के सवाल आज आनमानस के अंतरमन में गूंज रहे है। आइए इन सब मुद्दो पर बात करते हैं। 

सरकारों द्वार लाए जाने वाले बिल को समझने के लिए सबसे पहले यह जानना जरुरी हो जाता है कि उस कानून में कोन-कोन सी बातें सरकार के द्वारा कही गई हैं। तो जानते है कि इस मसौदे के प्रमुख प्रवधानों को- 
* 2 से अधिक बच्चे होने पर सरकारी नौकरियों में आवेदन नहीं कर पाएंगे.
* 2 बच्चों से ज़्यादा वाले स्थानीय निकाय का चुनाव नहीं लड़ पाएंगे।
* दो बच्चों से ज्यादा वाले को सब्सिडी वाली सुविधाओं का फायदा नहीं मिलेगा।
* जो जनसंख्या नीति का पालन करेगा, उसे प्रोत्साहन दिए जाएंगे। अगर कोई सरकारी नौकरी में है तो उसे अतिरिक्त वेतन वृद्धि दी जाएगी, उसके पेंशन प्लान में सरकार का कंट्रीब्यूशन 3 परसेंट बढ़ेगा। प्राधिकरण के मकान और प्लॉट के आवंटन में वरीयता दी जाएगी। बच्चों की शिक्षा, चिकित्सा निशुल्क होगा। इस तरह की कई सुविधाएं दी जाएंगी।
* परिवार नियोजन के तरीके अपनाने वालों को प्रोत्साहन दिया जाएगा। जैसे अगर बीपीएल परिवार एक बच्चे के बाद नसबंदी करा लेता है तो उसे एक लाख रुपया एकमुश्त दिया जाएगा।
* ग्रेजुएशन तक बच्चे की पढ़ाई और इलाज राज्य सरकार के जिम्मे होगा।
* बच्चों को मेडिकल और इंजीनियरिंग जैसे कॉर्सेस में दाखिले के दौरान वरीयता दी जाएगी। एक ही संतान होने पर प्रोत्साहन ज्यादा दिया जाएगा।
* इसमें कोई दंडात्मक प्रावधान नहीं रखा गया है। जो व्यक्ति बातों को नहीं मानेगा, उसे प्रोत्साहन नहीं मिलेगा। 
 हिंदुस्तान की आबादी

जनसंख्या कानून के बारे में बात करने से पहले इस बात को जान लेते है कि भारत में जनसंख्या की वर्तमान स्थिति क्या है?  दरअसल आजादी के वक्त भारत की जनसंख्या 36 करोड़ थी, जो आज 136 करोड़ तक पहुंच गई है। इसके साथ ही हिंदुस्तान 2027 तक दुनिया में सबसे ज्यादा आबादी वाला देश बन जाएगा। 2011 की जनगणना के अनुसार भारत में प्रतिवर्ष 2 करोड़ 40 लाख बच्चे पैदा होते हैं और हर साल 88 लाख लोगों की मौत होती है। इस हिसाब से हिंदूस्तान की आबादी में लगभग डेढ़ करोड़ का इजाफा हो रहा है। कई लोग जनसंख्या घटाने के लिए एक आकड़ा ये भी देते है कि भारत के पास दुनिया का 2.4 प्रतिशत भू-भाग है। यहां पर हैरानी की बात ये है दुनिय की आबादी में भारत की लगभग 18 प्रतिशत की हिस्सेदारी है। इसका सीधा-सीधा मतलब यह हुआ कि संसाधनों के हिसाब से हमारे देश की आबादी ज्यादा है और इन आकड़ो के आधार पर देश के कई लोग आबादी पर नियंत्रण की बात को स्वीकार करते हैं। 

यूपी में जनसंख्या वृद्धि का क्या है हाल?

जनसंख्या वृद्धि का पैमाना फर्टिलिटी रेट या प्रजनन दर को बनाया जाता है। प्रजनन दर यानी एक महिला अपने जीवनकाल में कितने बच्चों को जन्म देगी, इसके अनुमान के आधार पर औसत प्रजनन दर निकाली जाती है। राज्यवार प्रजनन दर के आकंड़े नीति आयोग की वेबसाइट पर मिलते हैं। इनके मुताबिक देश में 2016 में कुल प्रजनन दर 2.3 थी और इसके घटने का पैटर्न मिलता है। अगर हम थोड़ा और पीछे जाएं तो साल 2000 में प्रजनन दर 3.2 थी जो 2016 तक घटकर 2.3 हो गई। अगर यूपी की बात करें तो 2016 में प्रजनन दर 3.1. थी यानी राष्ट्रीय औसत से ज्यादा लेकिन यूपी में भी प्रजनन दर घटने का पैटर्न रहा है।

यहां साल 2000 में प्रजनन दर 4.7 थी जो 2016 तक घटकर 3.1 रह गई। सीएम योगी आदित्यनाथ अपने जनसंख्या नीति में इसे घटाकर अगले 10 साल में 1.9 तक लाने का लक्ष्य रख रहे हैं और इसके लिए एक कानून ला रहे हैं। हालांकि कई धार्मिक नेता और राजनेता इसके विरोध में भी आ गए हैं। बिहार के मुख्यमंत्री नीतिश कुमार जनसंख्या नीति के कानून पर बयान आया है कि सिर्फ कानून बनाकर जनसंख्या दर नहीं घटाई जा सकती, महिलाएं पढ़ी लिखी होंगी तभी जनसंख्या घटेगी. ये बात भी सही है। अब इस बात का मनन आप करें कि क्या हमारे देश के लिए इस प्रकार के कानून की जरुरत है या नहीं? 

अगर बात की जाए कि संसाधन की कमी से अलग बच्चे पैदा करने की तो यह भी महिलाओं पर अत्याचार की तरह ही है। आए दिन देश-प्रदेश से खबरें आती रहती है कि कई महिलाओं की मौत डिलवरी के दौरान हो जाती है और इस बात को भी सत प्रतिशत स्वीकार करना ही पड़ेगा कि ज्यादा बच्चे पैदा करने से महिलाओं के स्वास्थ्य पर भी बुरा प्रभाव पड़ता है। हमारे इस रुढ़ीवादी समाज में आज भी बच्चों की जिम्मेदारी पुरुषों से ज्यादा महिलाओं की ही होती है। यानी बच्चे पैदा करने से पालने तक का बोझ महिला पर ही होता है।