अंतर्राष्ट्रीय मजदूर दिवस: दयनीय है भारत में कृषि मजदूरों की हालत, हजारों की तादाद में रोज होता है पलायन !

श्रम मेव जयते” अर्थात श्रम की जय हो. मजदूरों और मेहनती लोगों के बारे में इस तरह की न जाने कितनी ही बाते लिखी और कही गई है, साहिर लुधियानवी तो यहां तक कहते हैं

अंतर्राष्ट्रीय मजदूर दिवस: दयनीय है भारत में कृषि मजदूरों की हालत, हजारों की तादाद में रोज होता है पलायन !
अंतर्राष्ट्रीय मजदूर दिवस: दयनीय है भारत में कृषि मजदूरों की हालत, हजारों की तादाद में रोज होता है पलायन !

कि “हम मेहनतवालों ने जब भी मिलकर क़दम बढ़ाया, सागर ने रस्ता छोड़ा पर्वत ने शीश झुकाया.” श्रम की इसी महत्वता को समझते हुए आज के दिन पूरी दुनिया मजदूर दिवस मना रही है. ये दिन श्रम के उन पूजारियों का है, जिनकी बदौलत हमा सभ्य होने का दावा करते हैं. वैसे तो मजदूरों की हालत देशभर में खराब ही है, लेकिन सबसे अधिक दयनीय स्थिती कृषि मजदूरों की है.

इन मजदूरों की बात करना इसलिए भी जरूरी है, क्योंकि इन्हें मजदूर माना ही नहीं जाता. न तो मजदूरों को मिलने वाले फायदों से ये लोग लाभांवित होते हैं और न ही आम तौर पर किसी दुर्घटना में घायल होने पर इन्हें किसी तरह की सहायता मिलती है. लेकिन बावजदू इसके, वो हमारे खेतों को अपने खून-पसीने से सिंचते हुए लहलहा देते हैं.  

कृषि मजदूरों के प्रकार

संलग्न मजदूर 

यह वह मजदूर हैं जिनके पास अपनी भूमि नहीं होती. मौखिक या लिखित अनुबंध द्वारा जुड़कर दूसरे किसानों के लिए ये लोग मेहनत करते हैं. इसमें इनका रोजगार रोज़गार स्थाई होता है. अधिकतर अनुबंध मौखिक ही होते हैं, इसलिए वो कब तोड़ दिए जाए या मालिक कब मुकर जाए, कुछ कहा नहीं जा सकता. 

अनौपचारिक मजदूर

इस प्रकार के मजदूर किसी भी किसान के खेतों में कार्य करते हैं. इन्हें दैनिक मजदूर भी कहा जा सकता है. इनमें से अधिकतर मजदूरों का रोजगार असुरक्षित ही माना जाता है. इनके पास नाममात्र की सामाजिक सुरक्षा ही होती है, जिस कारण इनका अस्तित्व खतरे में ही रहता है. 

भारत में करीब 3 करोड़ घुमंतू मजदूर हैं, जिनकी हालत सबसे कमजोर है. बुवाई, निराई, कटाई आदि का काम समाप्त होते ही, ये लोग बेरोजगार हो जाते हैं. परिणामस्वरूप बाकि राज्यों में इनका पलायन होता है. इनके पास न अपनी छत होती है, न पराए राज्य का राशन कार्ड. 

सामाजिक असुरक्षा

आर्थिक असुरक्षा के अलावा इन लोगों को सामाजिक असुरक्षा का खतरा भी लगा रहता है. हरिजन मजदूरों के साथ तो अक्सर गांवों में भेदभाव होता है. उन्हें अवसरों और संसाधनों से वंचित रखा जाता है. हमारे देश की सरकारी नीतियों में सुरक्षात्मक कार्यों का अभाव है, जो थोड़े बहुत नियम बनाए भी गए हैं, वो धरातल पर लागू नहीं होते. मजदूरों की बीमारी अथवा श्रम कमाने योग्य स्थिती में न होने पर उन्हें किसी प्रकार का लाभ सरकार से नहीं मिलता. क्या ये हमारे समाज का दुर्भाग्य नहीं है कि देश की कुल आय में 50% योगदान देने वाला समूह सबसे अधिक अमानवीय व्यवहार, कम भुगतान और सामाजिक बेरुखी का शिकार होता है.