जानें, आखिर क्यों इस गांव के लोग अपना घर छोड़कर गाड़ियों में रह रहे हैं 

हर इंसान का एक ख्वाब होता है कि वह अपनी जिंदगी में एक छोटा-सा आसियाना जरूर बनाएं, लेकिन अफसोस कुछ लोग इसमें सफल होते हैं तो कुछ इसमें विफल रहते हैं, मगर आपको यह जानकर हैरानी होगी कि कुछ लोग ऐसे भी हैं, जिनके पास अपना घर होने के बावजूद भी यह गाड़ियों में ही अपना जीवन गुजार रहे हैं।

जानें, आखिर क्यों इस गांव के लोग अपना घर छोड़कर गाड़ियों में रह रहे हैं 
Bihar Govt

हर इंसान का एक ख्वाब होता है कि वह अपनी जिंदगी में एक छोटा-सा आसियाना जरूर बनाएं, लेकिन अफसोस कुछ लोग इसमें सफल होते हैं तो कुछ इसमें विफल रहते हैं, मगर आपको यह जानकर हैरानी होगी कि कुछ लोग ऐसे भी हैं, जिनके पास अपना घर होने के बावजूद भी यह गाड़ियों में ही अपना जीवन गुजार रहे हैं। अपने घरों को छोड़कर गाड़ियों में रहने को मजबूर हो चुके इन लोगों की व्यथा अब कोई सुनने वाला नहीं रह गया है। वहीं, किसी को भी जब यह पता लग रहा है कि यह लोग अपना घर छोड़कर गाड़ियों में अपना जीवन व्यतित कर रहे हैं, तो उनके होश फाख्ता हो रहे हैं। आइए, हम आपको ऐसे ही लोगों की कहानियों के कुछ पहलुओं के बारे में बताने जा रहे हैं, जो अपना घर छोड़कर गाड़ियों में रहने को मजबूर हो चुके हैं। 

 सूबा बिहार...जिला मुजफ्फरनगर और मधुबनी....यहां के लोग अब घरों से रूखसत होकर अपनी बकाया जिंदगी गुजारने के लिए गाड़ियों में ही अपना   ठिकाना तलाश रहे हैं। ऐसा नहीं है कि इनके पास अपना घर नहीं है, बल्कि इनके पास अपना खुद का बना बनाया घर है, लेकिन इसके बावजूद भी यह लोग गाड़ियों में रह रहे हैं, क्योंकि पिछले काफी दिनों से बिहार के कुछ जिलों में बाढ़ का कहर अपने चरम पर पहुंच चुका है। बेशुमार लोगों के घर बाढ़ के कहर का शिकार होकर स्वाहा हो चुके हैं। ऐसे में लोगों के पास अपनी जिंदगी गुजारने के लिए कोई ठिकाना नहीं बचा है और इनके पास इतनी  कमाई भी नहीं है कि यह लोग फिर से अपना घर बना लें। ऐसे में यह लोग अब गाड़ियों में रहने को मजबूर हो चुके हैं। वहीं, अपनी दैनिक जरूरतों की पूर्ति के लिए यह लोग अब गाड़ियों में रहने के साथ-साथ दकानें खोल रहे हैं, ताकि अपनी रोजमर्रा की जरूरतों की पूर्ति कर सकें। 

वहीं, इस मसले को लेकर सरकार के रूख की बात करें, तो वो भी अब मकूदर्शक ही बनी हुई है। मदद के नाम पर त्रासदी झेल रही जनता को महज शासन की तरफ से खामोशी ही नसीब हो रही है। ऐसे में अगर खामोशी का यह सिलसिला लंबा चला तो लोगों की व्यथा अपनी हदों को पार करने पर आमादा हो जाएगी। यकीनन, बिहार सरकार की यह संवेदनहीनता अब अपने चरम पर  पहुंचकर लोगों को बदहाल कर चुकी है। वहीं, बाढ़ के कहर से बदहाल हुए लोग अपनी व्यथा साझा करते हुए कह रहे हैं कि इस बाढ़ ने हमसे हमारी आजीवन की कमाई छीन ली है। आलम यह है कि अब हम बेघर, असहाय, लाचार हो चुके हैं। हमरी कोई मदद करने वाला नहीं है। ऐसे में अब यह देखना होगा कि आखिर बिहार सरकार जनता-जनार्दन की व्यथा को कब तक नजरअंदाज करती है। यह तो फिलहाल भविष्य के गर्भ में छुपा है। तब तक के लिए आप देश दुनिया की हर बड़ी खबर से रूबरू होने के लिए पढ़ते रहिए....शाइंनिंग इंडिया.कॉम